Srikanta (Hindi)

Author :Sarat Chandra Chattopadhyay

Category : Home

ISBN No :

Language :English

Formats: ePub



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मेरी सारी जिन्दगी घूमने में ही बीती है। इस घुमक्कड़ जीवन के तीसरे पहर में खड़े होकर, उसके एक अध्याापक को सुनाते हुए, आज मुझे न जाने कितनी बातें याद आ रही हैं। यों घूमते-फिरते ही तो मैं बच्चे से बूढ़ा हुआ हूँ। अपने-पराए सभी के मुँह से अपने सम्बन्ध में केवल 'छि:-छि:' सुनते-सुनते मैं अपनी जिन्दगी को एक बड़ी भारी 'छि:-छि:' के सिवाय और कुछ भी नहीं समझ सका। किन्तु बहुत काल के बाद जब आज मैं कुछ याद और कुछ भूली हुई कहानी की माला गूँथने बैठा हूँ और सोचता हूँ कि जीवन के उस प्रभात में ही क्यों उस सुदीर्घ 'छि:-छि:' की भूमिका अंकित हो गयी थी, तब हठात् यह सन्देह होने लगता है कि सब लोग इस 'छि: छि:' को जितनी बड़ी बनाकर देखते थे उतनी बड़ी शायद वह नहीं थी। जान पड़ता है, भगवान जिसे अपनी सृष्टि के ठीक बीच में जबरन धकेल देते हैं शायद उसे भला लड़का कहलाकर एग्जाम पास करने की सुविधा नहीं देते; और न वे उसे गाड़ी-घोड़े पालकी पर लाव-लश्कर के साथ भ्रमण करके 'कहानी' नाम देकर छपाने की ही अभिरुचि देते हैं। उसे बुद्धि तो शायद, वे कुछ दे देते हैं, परन्तु दुनियादार लोग उसे 'सु-बुद्धि' नहीं कहते। इसी कारण उसकी प्रवृत्ति ऐसी असंगत, ऐसी निराली होती है, और उसके देखने की चीजें, और जानने की तृष्णा, स्वभावत: ऐसी बेजोड़ होती हैं कि यदि उसका वर्णन किया जाए तो, शायद, 'सु-बुद्धि' वाले हँसते-हँसते मर जाँय। उसके बाद वह मन्द बालक; न जाने किस तरह, अनादर और अवहेलना के कारण, बुरों के आकर्षण से और भी बुरा होकर, धक्के और ठोकरें खाता हुआ, अज्ञात-रूप से अन्त में किसी दिन अपयश की झोली कन्धों पर रखकर कहीं चल देता है, और बहुत समय तक उसका कोई पता नहीं लगता।

अतएव इन सब बातों को रहने देता हूँ। जो कुछ कहने बैठा हूँ वही कहता हूँ। परन्तु कहने से ही तो कहना नहीं हो जाता। भ्रमण करना एक बात है और उसका वर्णन करना दूसरी बात। जिसके भी दो पैर हैं, वह भ्रमण कर सकता है किन्तु दो हाथ होने से ही तो किसी से लिखा नहीं जा सकता। लिखना तो बड़ा कठिन है। सिवाय इसके, बड़ी भारी मुश्किल यह है कि भगवान ने मेरे भीतर कल्पना-कवित्व की एक बूँद भी नहीं डाली। इन अभागिनी आँखों से जो कुछ दीखता है, ठीक वही देखता हूँ। वृक्ष को ठीक वृक्ष ही देखता हूँ और पहाड़-पर्वतों को पहाड़-पर्वत। जल की ओर देखने से वह जल के सिवाय और कुछ नहीं जान पड़ता।

Sarat Chandra Chattopadhyay was born on September 15, 1876,in Devanandapur, a small village two miles northwest of Bandel in Hooghly, West Bengal. His father Motilal Chattopadhyay was an idler and dreamer who held irregular jobs. He could not finish novels and stories that he had started writing, but passed on his imagination and love of literature to Sarat Chandra. He, wife Bhuvanmohini, and their five children lived for many years in his father-in-law Kedarnath Gangopadhyay's house in Bhagalpur, Bihar.

Sarat Chandra was a daring, adventure-loving boy. Most of his schooling was in informal village schools called pathshalas.He was a good student and got a double promotion that enabled him to skip a grade. He passed his Entrance Examination (public examination at the end of Class X) but could not take his F.A. (First Arts) examination or attend college due to lack of funds.

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